पिता_कविता

 


"गुप्तरत्न " "भावनाओं के समंदर मैं "

दिनभर मेहनत की आग में जलता है ,
अपना सुख चैन सब एक किनारे रखता है /
तब कही बेटे के चेहरे में नयी साइकिल की ख़ुशी ,
और बेटी के तन पे नए लिबास का रंग फबता है /
मां रोके कह देती है दुखड़े सारे ,पर
वो तो  मर्द है न , रो भी नहीं सकता है ,
अपना सुख चैन सब किनारे रखता है .....
दिन भर मेहनत की आग में जलता है ,
अच्छे खाने का शौक भी शौक़ से रखता है ,
पर बेटी के हाथों का जला खाना भी स्वाद से चखता है ,
दिल पे पत्थर रखकर,बेटे की गल्ती पर उसको गाली भी बकता है,
बेटी के आंसू गिरने पर उसका दिल भी दुखता है ,
पिता है जैसे तैसे भी हो, पर सब mangae करता है ,
अपना सुख चैन सब .....
जो कभी खुद न पढ़ पाया उन महंगे school में ,
पर खुद के शौक किनारे रखके,
बच्चो के स्कूल की वो महंगी फीस भी भरता है ,
पिता है बच्चो की खुशियों के लिए सब कुछ वो करता है ,
दिन रात मेहनत की आग में जलता है ....

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