सोमवार, 28 जून 2021

# पहले घरो के आगंन में जलता अलाव था ,

 


 पहले घरो के आगंन में जलता अलाव था ,

साथ बैठता था परिवार ,उसमे एक लगाव था ,

भूनकर खाते थे मटर के दाने उसमे,

नही मिला कही वो स्वाद ,उस खाने में एक चाव था ,

अब अलग अलग घर है ,घरों में कमरे भी अलग है ,

है सब अपने , है  साथ , फिर भी सब अलग है ,

रूम हीटर ने ले ली जगह अब कहाँ अलाव जलते है ,

किसने ,किसको कब क्या कहा , दिलों में बस ये घाव पलते है ,

अब कहाँ होती है ,वो सुबह,जहाँ चाय मिलकर सब पीते थे ,

काटते नही ,वक़्त को  लगता है मानो वो जीते थे ,

कहाँ होती है वो सुबह ,

अब तो ओ बस जिम्मेदारियों के तले  दिन ढलते है ,

किसने किसको कब क्या कहाँ ,दिलों में ये ही घाव पलते है .......,

कसूर नही किसी का, कुछ जरूरतें बढ़ी और कुछ लालच भी ,

हो गए आधुनिक ,बन गया  शहर  जो पहले गावं था,

वरना पहले घरों में जलता अलाव था ...............साथ बैठता था परिवार ...



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